रात को एक चाँद मिला
वो भी आँखों से भिगा भिगा,
धीरे धीरे बादलों ने उसे
अपनी बाँहों मे ले लिया
मै आखरी तक उसको देखतां रहा ~
क्या फिर कभी वो दिखायी देगा ?
मैंने अपने मन से पुछा
तो अंदर से आवाज़ निकली -
"नहीँ"
मैं घबरा सा गया
"क्यो आते है ऐसे चाँद जीवन मे"
कुछ पल की ख़ुशी देकर
सारी जिंदगी ग़मो के साये देते है
वैसे चाँद तो कल भी निकलेगा
बादल कल भी आयेंगे
वो फिर डूब जायेगा
कुछ पल की रौशनी देकर
पर वो चाँद सबसे अलग था
मासूम, भोला, चेहरे पर मुस्कुराहट
आँखों मे नमी, होंठों पे शबनम
वाह ! क्या बात थी यार.......
सोचते सोचते कब सूरज निकल आया
पता ही नहीँ चला.......
- प्रफुल्ल शिंदे
No comments:
Post a Comment