" मेरी मंज़िल "
ऐ रास्ता लें चल मुझे कहीँ
मंज़िल मेरी तय हैं के नहीँ
यह देखना हैं मुझे.........
रास्ता नहीँ यह सफ़र हैं जिंदगी का
जिंदगिसे लढकर जितना हैं मुझे
वक्त के सीखे हैं हम सब यहाँ
सबको हराकर जितना हैं मुझे
मंजिल मेरी ................... (1)
कभी अंगारों से तो कभी काटो से
डटके गुजरकर चलना हैं मुझे
आवाज की बाहों में बाँहें डालकर
मुस्कुराकर चलना हैं मुझे
मंजिल मेरी .................. (2)
पीछे मुडने का वजूद ना हों कभी
उस वजूद को मिटाकर हँसना हैं मुझे
कयामत की रातें याद ना आये कभी
उन यादों को भुलाकर हँसना हैं मुझे
मंजिल मेरी .................. (3)
शिकस्त की बाजी पलटकर
फतेह हांसिल करनी हैं मुझे
मंजिल मेरी तय हैं के नहीँ
यह देखना हैं मुझे........... (4)
:- प्रफुल्ल म. शिंदे
अकोला, 9158568856
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